Jabalpur News: देवताओं के पाप धोने के लिए हुआ था मां नर्मदा का प्राकट्य

हिंदू पंचांग के अनुसार माघ माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि पर मां नर्मदा का जन्म हुआ था। ये दिन प्रत्येक वर्ष नर्मदा जयंती के रुप में मनाया जाता है।

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By Shivansh Shukla
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Mother Narmada

जबलपुर। वैसे तो ये पर्व पूरे भारत में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है लेकिन  मां नर्मदा का जन्म स्थान मध्य प्रदेश के अमरकंटक में है। वहां इसकी अलग ही धूम देखने को मिलती है। देश-विदेश से श्रद्धालु मां नर्मदा के दर्शन करते आते हैं और उनके पवित्र जल में डूबकी लगाकर हमेशा के लिए पाप मुक्त होते हैं।

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लोक मान्यता के अनुसार भगवान शिव ने देवताओं के पाप धोने के लिए मां नर्मदा को उत्पन्न किया था। एक कथा के अनुसार भगवान शिव अंधकासुर राक्षस का वध करने के बाद (अमरकंटक) मे कल पर्वत पर समाधिस्थ हो गए। जगत पिता ब्रह्मा, श्री हरि विष्णु और सभी देवता उनके पास गए। अनेकों प्रकार से उनकी स्तुति और प्रार्थना करने के बाद उन्होंने आंखें खोलीं।

देवताओं ने भगवान शिव से प्रार्थना करते हुए कहा, ‘ हमने जाने-अनजाने बहुत सारे पाप किए हैं, उनका निवारण करने का मार्ग बताएं।’ भगवान शिव की भृकुटि से एक तेजोमय बिंदु धरती पर गिरा, जो एक कन्या के रूप में परिवर्तित हो गया। वे कन्या मां नर्मदा थी। उन्हें त्रिदेव के साथ-साथ सभी देवताओं से वरदान प्राप्त हुए।

भगवान शिव ने माघ शुक्ल सप्तमी को मकर राशि सूर्य मध्याह्न काल के वक्त मां नर्मदा को नदी रूप में बहने के लिए कहा। मां नर्मदा निवेदन करते हुए बोली, ‘धरतीवासियों के पापों को मैं कैसे दूर करुंगी।’ भगवान विष्णु ने कहा, आप में सभी पापों को हरण करने की शक्ति होगी। जिन पत्थरों को आपके जल में आने का सौभाग्य मिलेगा, वे शिव तुल्य पूजे जाएंगे।

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भगवान शिव ने कहा, जैसे उत्तर में स्वर्ग से आकर गंगा प्रसिद्ध हुई, वैसे ही आप दक्षिण गंगा के नाम से विख्यात हो। नर्मदा के पवित्र जल में स्नान करने से न केवल मनुष्य बल्कि देवता भी पाप मुक्त होते हैं। ऐसा माना जाता है की एक समय भगवान शिव तपस्या में लीन थे। उनके शरीर से पसीना निकलने लगा। देखते ही देखते पसीने ने नदी का रूप ले लिया और वह नर्मदा नदी के नाम से प्रसिद्ध हुई।

नर्मदा जी का विवाह न करने का निर्णय
एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, जब नर्मदा जी बड़ी हुईं तो उनके पिता मैखलराज ने उनका विवाह राजकुमार सोनभद्र से तय कर दिया। एक बाद उनको राजकुमार से मिलने की इच्छा हुई तो उन्होंने एक दासी को उनसे मिलने के लिए भेजा। वह दासी राजसी आभूषणों से अलंकृत थी, जिसे राजकुमार सोनभद्र नर्मदा समझ लिए। दोनों का विवाह हो गया। काफी समय बीतने के बाद भी दासी के वापस न लौटने पर नर्मदा जी स्वयं राजकुमार सोनभद्र से मिलने पहुंचीं। उन्होंने राजकुमार सोनभद्र को दासी के साथ पाया। तब वे काफी दुखी हुईं और कभी विवाह न करने का निर्णय लिया। कहा जाता है कि उसके बाद से ही मां नर्मदा पश्चिम की ओर चल दीं। उसके बाद से वे कभी वापस नहीं लौटीं, इसलिए मां नर्मदा आज भी पश्चिम दिशा में बहती हैं।

कालसर्प दोष हमेशा के लिए खत्म 
 अगर किसी व्यक्ति की कुंडली में कालसर्प दोष है तो नर्मदा जंयती के दिन चांदी के नाग नगिन का जोड़ा नर्मदा नदी में प्रवाहित करें। ऐसा करने से कुंडली से कालसर्प दोष हमेशा के लिए खत्म हो जाता है।

नर्मदा जयंती शुभ मुहूर्त 
माघ माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि फरवरी 15, 2024 को सुबह 10 बजकर 12 मिनट पर शुरू होगी। वहीं, इसका समापन फरवरी 16, 2024 को सुबह 08 बजकर 54 मिनट पर होगा। ऐसे में नर्मदा जयंती 16 फरवरी को मनाई जाएगी।
- अलेख उमाशंकर अवस्थी

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